मिलन-माधुरी · पद 14
कालि की, बात कहौं आली।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kāli kī, bāta kahauṁ ālī!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कालि की, बात कहौं आली।
2भानु-सुता-तट भानु-सुता गइ, कालि आलि लाली।
3तहँ रह मुरली मधुर बजावत, ठाढ़ो वनमाली।
4द्वै दृग ह्वै गये चार अचानक, प्रेम-पाश घाली।
5लखतहिं गिरी नागरिहिं गागरि, निर्मल-जल वाली।
6उत “कृपालु” नागर गिरि मुरलिहुँ, कह देखी भाली॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से श्यामा-श्याम के प्रथम मधुर-मिलन की बात बताती हुई कहती है कि अरी सखि! कल की बात है, श्री किशोरी जी यमुना के किनारे गयी थीं। वहीं पर श्यामसुन्दर खड़े हुए मुरली बजा रहे थे। अचानक दोनों की आँखें चार हो गयीं एवं दोनों प्रेम-रस विभोर हो गये। इधर तो श्री किशोरी जी के सिर पर रखी हुई निर्मल जल वाली गागरी नीचे गिर गयी और उधर 'कृपालु' के शब्दों में क के हाथ से मुरली भी गिर गयी। देखी बता रही हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 573-574