मिलन-माधुरी · पद 15
कोउ जनि, जाहु जमुन असनान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kou jani, jāhu jamuna asanāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कोउ जनि, जाहु जमुन असनान।
2जादू करत फिरत पनघट पै, इक जादूगर कान्ह।
3मोहन मंत्र फूँकि मनमोहन, मोहत मुरलिहिं तान।
4जो कोउ तानहुँ सोँ बचि आवे, मारत नैनन बान।
5परम चतुर ललिता-सी कालिहिं, हारीं तन मन प्रान।
6पुनि “कृपालु” भोरिन गोरिन गति, कौन होय भगवान॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है-अरी सखियों! करने के लिये कोई भी मत जाओ। पनघट पर जादू करता फिरता है। द्वारा मोहन-मन्त्र फूँक कर सब को मोहित कर लेता है। कोई मुरली की तान से भी बच जाता है तो उस पर कटाक्षपात करता है। सखियों में चतुर शिरोमणि ललिता सखी सरीखी भी कल अपना तन, मन, प्राण खो आयीं। अरी सखियों! तब भोली-भाली सखियों की हाय राम!! गति होगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 574