मिलन-माधुरी · पद 16
कोउ बेगि बुझाओ, हौं जरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kou begi bujhāo, hauṁ jarī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कोउ बेगि बुझाओ, हौं जरी।
2तरणि-तनूजा-तट सखियन सँग, कालि रही सखि हौं खरी।
3मारि दियो तहँ नैन-बान उन, मुरछित छिति गिरि हौं परी।
4पुनि कह"प्यार करेगी?"यह सुनि, ना ना ना हाँ हौं करी।
5मृदु मुसकाय गये पिय उत, इत, जात विरह महँ हौं मरी।
6बुझति न आग “कृपालु” हारि गइ, जल बरसावत हौं हरी॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखि! मैं जली जा रही हूँ, कोई मेरी जलन को बुझा दे। मैं कल यमुना के किनारे सखियों के साथ खड़ी थी। वहीं पर श्यामसुन्दर ने नैनों के बाण मार दिये एवं मै मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। मूर्छा समाप्त होने पर उन्होंने कहा-मुझसे प्यार करेगी? इसके उत्तर में न तो मैंने 'ना'कहा और न 'हाँ ही कहा। उधर श्यामसुन्दर मुस्कुराकर चल दिये, इधर विरह मेरा प्राण ले रहा है। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि मैं आँखों से आँसू बरसाते-बरसाते थक गयी फिर भी यह विरह की आग नहीं बुझती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 574-575