मिलन-माधुरी · पद 17
गई डसि नागिनि अबहीं भोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaī ḍasi nāgini abahīṁ bhora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गई डसि नागिनि अबहीं भोर।
2सो नागिनि रहि श्याम रंग की,फन रहे अति बरजोर।
3वाके जीभ रही दुइ सजनी!, अंगनि रह्यो मरोर।
4वाके डसतहिं गिरी धरणी कहि,"हाय भला हो तोर"।
5अब सखि द्रुत उपचार करहु कछु, प्राण जात हैं मोर।
6सुनु “कृपालु” सखि! एक मदारी, झारत नंद किशोर॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अंतरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! आज मुझे सवेरे ही एक नागिन ने डस लिया। वह नागिन श्याम रंग की थी। उसके फन अत्यन्त ही भयानक थे (श्यामसुन्दर के कटाक्ष से अभिप्राय है) उसके दो जीभ थीं एवं उसके प्रत्येक अंग में मरोड़ थी (त्रिभंगीलाल)। उसके ( का ही, 'हाय तेरा भला हो 'ऐसा कह कर, मैं पृथ्वी पर गिर पड़ी। अब सखि, मेरे प्राण जा रहे हैं, शीघ्रातिशीघ्र कुछ औषधि कर। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! नन्दकिशोर नामक मदारी इस विष के उतारने का मंत्र जानते हैं अर्थात् बे ही तो नागिन हैं, मुझसे क्यों छिपाती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 575-576