मिलन-माधुरी · पद 18
गई मैं, गिरिधर पर बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaī maiṁ, giridhara para balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गई मैं, गिरिधर पर बलिहार।
2कालि आलि वनमालिहिं देख्यों, मंजु निकुंज मझार।
3लखि त्रिभुवन संपति भइ खारी, खारी मुक्ति हुँ चार।
4लोक वेद के विधि निषेध सब, दिये भार महँ डार।
5ललित त्रिभंग अंग प्रत्यंगनि, कोटि ब्रह्म सुख वार।
6मूकास्वादनवत् “कृपालु” बस, रसिकहिं जाननिहार॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि मैं श्यामसुन्दर पर बलिहार गयी। अरी सखि! कल मैंने सुन्दर निकुंज में बनमाली को देखा। देखते ही त्रैलोक्य की सम्पत्ति एवं चारों प्रकार की मुक्ति खारी लगने लगीं। अब मैंने लोक वेद के सभी कर्तव्याकर्तव्य के नियमों को भाड़ में डाल दिया एवं तीन स्थान से टेढ़े श्यामसुन्दर के प्रत्येक अंग के सौन्दर्य पर करोड़ों ब्रह्मानन्द न्यौछावर कर दिये। 'कृपालु' के शब्दों में इस रस को गुँगे के गुड़ के आस्वादन के समान एकमात्र रसिक लोग ही जान सकते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 576-577