मिलन-माधुरी · पद 19
गई लखि, मधुर-मिलन बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaī lakhi, madhura-milana balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गई लखि, मधुर-मिलन बलिहार।
2उत ते आई रूप-उजागरि, नागरि-भानुदुलार।
3इत ते आये सब-गुन-आगर, नागर-नंदकुमार।
4तरणि-तनूजा तट दोउन दृग, भये अचानक चार।
5सखिन टेर नहिं सुनति लली इत, इकटक रहीं निहार।
6उत “कृपालु” नहिं सुनत टेर हरि, हारे सखन पुकार॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि आज मैं प्रिया-प्रियतम के मधुर मिलन को देखकर बलिहार गयी। अरी सखी! इधर से तो लावण्यमयी वृषभानुनन्दिनी आयीं और उधर से गुण-सागर रसिक श्यामसुन्दर आये। यमुना के किनारे अचानक दोनों की आँखें चार हो गयीं। इधर तो किशोरी जी इतनी विभोर होकर निर्निमेष-दृष्टि से श्यामसुन्दर को देख रही हैं कि ललितादिक सखियों के उच्चघोष को भी नहीं सुन पायीं। 'कृपालु' के शब्दों में उधर श्यामसुन्दर भी किशोरी जी को देखकर इतने विभोर हो गये कि सखाओं के उच्चघोष को भी नहीं सुन सके।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 577