मिलन-माधुरी · पद 20
गई हिय, तीछी बीछी मार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaī hiya, tīchhī bīchhī māra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गई हिय, तीछी बीछी मार।
2छिन-छिन बढ़त जात विष सब तन, कोउ करउ उपचार।
3सुनि उठि धाई सकल सहेलिन, हिलमिल कीन विचार।
4कोउ लगावति औषधि बहु विधि, कोउ मंत्र सोँ झार।
5मिटी न पीर तबहुँ जब, कोउ कह, है यह भूत बयार।
6यह “कृपालु” नँदपूत, भूत नहिं, किय हिय नैनन वार॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अंतरंग सखी से कहती है कि मेरे इट्य में अत्यन्त विषैले बिच्छू ने डंक मार दिया है, जिसका वेष सम्पूर्ण शरीर में प्रतिक्षण बढ़ता जा रहा है। कोई जल्दी से कुछ उपचार करो। यह सुनते ही उसकी सभी सखियों ने आपस में विचार किया। कोई सखी अनेक प्रकार की औषधि लगाती है, कोई सखी मन्त्र से झाड़ फूँक करती है। किन्तु जब किसी भी प्रकार पीड़ा कम नहीं हुई तब किसी ने कहा इसको कोई भूत लग गया है। इतने में 'कृपालु' ने जाकर कहा इसे भूत नहीं लगा वरन् "नंदपूत'लगा है, उसी ने इसके हृदय में नुकीले नेत्रों के बाणों से प्रहार किया है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 577-578