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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 21

गयो हरि, मो पै जादू डार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gayo hari, mo pai jādū ḍāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1गयो हरि, मो पै जादू डार।

2हौं जमुना-असनान करन गइ, तहँ रह नंदकुमार।

3पिय दृग पिय-रस-रूप माधुरी, दृगन बचाय निहार।

4रस-लंपट दृग पट घूँघट-पट, करन चहत जनु पार।

5जब घट भरि चलि घर नटवर तब, चट काँकरि दइ मार।

6फूट्यो घट टूट्यो घूँघट पट, औचक दृग भये चार।

7उत “कृपालु” नागरि इत गागरि, बहत प्रेम-जलधार॥

हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का, प्यारे श्यामसुन्दर से आँखों को बचाते हुए भी, अद्भुत प्रथम-मिलन।) हाय! हाय!! उस छलिया श्यामसुन्दर ने मेरे ऊपर जादू-सा कर दिया है। मैं यमुना-स्नान करने गई थी, अचानक वहीं पर वह भी आ गया। मैंने घूँघट की ओट से ही उसकी आँखों को बचाते हुए अपनी आँखों के द्वारा रूप रस-माधुरी का पान किया। पान करते ही आँखें उस रस में इतनी दीवानी हो गईं कि वे मानो अब घूँघट के वस्त्र को चीर कर निकल जाना चाहती हैं। किन्तु फिर भी मैंने अपनी आँखों को उनकी आँखों से नहीं मिलने दिया। जब मैं जल का घड़ा भरकर अपने घर की ओर चलने लगी, तब उस छलिया श्यामसुन्दर ने तुरंत ही पीछे से मेरे घड़े में कंकड़ी मार दी। मेरे घड़े में छेद हो गया एवं मैंने चौंककर अनजान अवस्था में, घूँघट की परवाह न करते हुए, ज्यों ही पीछे की ओर मुड़कर देखा, त्यों ही अचानक आँखें चार हो गईं। 'कृपालु' कहते हैं कि उस समय की क्या ही अनुपम झाँकी थी। एक ओर तो उस सखी के नेत्रों से प्रेम-अश्रु बह रहा था, एवं दूसरी ओर घड़े से जल बह रहा था। कवि ने उन दोनों को उसी अवस्था में छोड़ दिया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 578-579