# गयो हरि, मो पै जादू डार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0604-M15-K021
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 21
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 284–285

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गयो हरि, मो पै जादू डार।  
<a id="line-2"></a>हौं जमुना-असनान करन गइ, तहँ रह नंदकुमार।  
<a id="line-3"></a>पिय दृग पिय-रस-रूप माधुरी, दृगन बचाय निहार।  
<a id="line-4"></a>रस-लंपट दृग पट घूँघट-पट, करन चहत जनु पार।  
<a id="line-5"></a>जब घट भरि चलि घर नटवर तब, चट काँकरि दइ मार।  
<a id="line-6"></a>फूट्यो घट टूट्यो घूँघट पट, औचक दृग भये चार।  
<a id="line-7"></a>उत “कृपालु” नागरि इत गागरि, बहत प्रेम-जलधार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का, प्यारे श्यामसुन्दर से आँखों को बचाते हुए भी, अद्भुत प्रथम-मिलन।) हाय! हाय!! उस छलिया श्यामसुन्दर ने मेरे ऊपर जादू-सा कर दिया है। मैं यमुना-स्नान करने गई थी, अचानक वहीं पर वह भी आ गया। मैंने घूँघट की ओट से ही उसकी आँखों को बचाते हुए अपनी आँखों के द्वारा रूप रस-माधुरी का पान किया। पान करते ही आँखें उस रस में इतनी दीवानी हो गईं कि वे मानो अब घूँघट के वस्त्र को चीर कर निकल जाना चाहती हैं। किन्तु फिर भी मैंने अपनी आँखों को उनकी आँखों से नहीं मिलने दिया। जब मैं जल का घड़ा भरकर अपने घर की ओर चलने लगी, तब उस छलिया श्यामसुन्दर ने तुरंत ही पीछे से मेरे घड़े में कंकड़ी मार दी। मेरे घड़े में छेद हो गया एवं मैंने चौंककर अनजान अवस्था में, घूँघट की परवाह न करते हुए, ज्यों ही पीछे की ओर मुड़कर देखा, त्यों ही अचानक आँखें चार हो गईं। 'कृपालु' कहते हैं कि उस समय की क्या ही अनुपम झाँकी थी। एक ओर तो उस सखी के नेत्रों से प्रेम-अश्रु बह रहा था, एवं दूसरी ओर घड़े से जल बह रहा था। कवि ने उन दोनों को उसी अवस्था में छोड़ दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 578-579

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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