मिलन-माधुरी · पद 13
कामरी वारे पै, का मरी जात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kāmarī vāre pai, kā marī jāta?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कामरी वारे पै, का मरी जात।
2कारो रंग कौन बड़ नीको, द्वै तातरु द्वै मात।
3अति बेपीर, अहीर जाति को, हरजाई बलभ्रात।
4गति-मति-रति अति चंचल अलि ज्यों, छिन थिर रहि न सकात।
5आपु गँवार, गँवार-ग्वार सँग, अति स्वतंत्र मदमात।
6यह “कृपालु” कछु बात अटपटी, रसिक-जनन मनभात॥
हिन्दी भावार्थ
एक संखी अपनी अन्तरंग सखी से विनोद भरे शब्दों में प्रियतम श्यामसुन्दर की निन्दा-सी करती हुई कहती है।) अरी सखी! तू काला कम्बल ओढ्ने वाले श्यामसुन्दर पर क्यों भरी जा रही है? तू ही बता उसके शरीर का काला रंग भला कौन-सा अच्छा रंग है? उसके दो बाप एवं दो माताएं हैं वह अत्यन्त ही निष्ठुर है। उसकी जाति अहीर की है एवं वह बलराम का भाई अनंतानन्त गोपियों से प्रेम करता है। उसकी बुद्धि तथा उसका प्रेम भौरे के समान इतना चंचल है कि एक क्षण भी स्थिर नहीं रह सकता। स्वयं अशिक्षित है (अध्ययन तो मथुरा जाने के पश्चात् किया था)। अशिक्षित ग्वालों का संग है। अपनी इच्छा से कार्य करने वाला तथा उन्मत्त भी है। अतएव तू उसके लिए दीवानी मत बन। 'कृपालु' कहते हैं गा अरी सखी! तू प्रेम की इन अन्तरंग अटपटी बातों को नहीं समझ सकती। इसे तो रसिकजन ही समझते हैं कि जिसका जिससे प्रेम हो जाता है वह किसी भी प्रकार छूट नहीं सकता। अतएव वह सर्वथा विवश है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 572-573