# कामरी वारे पै, का मरी जात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0596-M15-K013
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 13
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 281–281

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कामरी वारे पै, का मरी जात।  
<a id="line-2"></a>कारो रंग कौन बड़ नीको, द्वै तातरु द्वै मात।  
<a id="line-3"></a>अति बेपीर, अहीर जाति को, हरजाई बलभ्रात।  
<a id="line-4"></a>गति-मति-रति अति चंचल अलि ज्यों, छिन थिर रहि न सकात।  
<a id="line-5"></a>आपु गँवार, गँवार-ग्वार सँग, अति स्वतंत्र मदमात।  
<a id="line-6"></a>यह “कृपालु” कछु बात अटपटी, रसिक-जनन मनभात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक संखी अपनी अन्तरंग सखी से विनोद भरे शब्दों में प्रियतम श्यामसुन्दर की निन्दा-सी करती हुई कहती है।) अरी सखी! तू काला कम्बल ओढ्ने वाले श्यामसुन्दर पर क्यों भरी जा रही है? तू ही बता उसके शरीर का काला रंग भला कौन-सा अच्छा रंग है? उसके दो बाप एवं दो माताएं हैं वह अत्यन्त ही निष्ठुर है। उसकी जाति अहीर की है एवं वह बलराम का भाई अनंतानन्त गोपियों से प्रेम करता है। उसकी बुद्धि तथा उसका प्रेम भौरे के समान इतना चंचल है कि एक क्षण भी स्थिर नहीं रह सकता। स्वयं अशिक्षित है (अध्ययन तो मथुरा जाने के पश्चात् किया था)। अशिक्षित ग्वालों का संग है। अपनी इच्छा से कार्य करने वाला तथा उन्मत्त भी है। अतएव तू उसके लिए दीवानी मत बन। 'कृपालु' कहते हैं गा अरी सखी! तू प्रेम की इन अन्तरंग अटपटी बातों को नहीं समझ सकती। इसे तो रसिकजन ही समझते हैं कि जिसका जिससे प्रेम हो जाता है वह किसी भी प्रकार छूट नहीं सकता। अतएव वह सर्वथा विवश है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 572-573

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
