मिलन-माधुरी · पद 12
कान्ह कछु कै गयो टोना री।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha kachhu kai gayo ṭonā rī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह कछु कै गयो टोना री।
2यमुना-तट रह धेनु चरावत, श्याम सलोना री।
3हौं तहँ गई, अचानक देखी, नंद डुठोना री।
4देखत ही मोहिं डस्यो दृगन जनु, नागिनि छोना री।
5तन, मन, प्राण सबै सखि! लै अब, दै गयो रोना री।
6दिवस “कृपालु” न चैन एक छिन, रैन न सोना री॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका अपनी एक अंतरंग सखी से कहना।) अरी सखी! श्यामसुन्दर मेरे ऊपर कुछ टोना-सा कर गया। यमुना के किनारे वह श्यामसुन्दर गाय चरा रहा था। मैं अचानक ही वहाँ पर गई एवं मैंने उसको देखा। देखते ही उसकी आँखों ने नागिन बनकर मुझे डस लिया। अरी सखी! वह मेरा तन, मन और प्राण सभी कुछ लेकर उसके बदले में रोना-मात्र ही दे गया। 'कृपालु' कहते हैं कि अब उसके वियोग में न तो मुझे दिन में एक क्षण के लिए चैन ही मिलता है और न तो रात में नींद ही आती है अर्थात् उसके मधुर-मिलन के लिए निरंतर तड़पती ही रहती हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 571-572