मिलन-माधुरी · पद 11
काँकरि मोरि मारी गागरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kāṁkari mori mārī gāgarī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1काँकरि मोरि मारी गागरी।
2सखि सँग जाति रही दधि बेचन, वृंदावन हौं नागरी।
3काँकरि लगत फूटि गइ गागरि, तब मोहिं अति रिस लाग री।
4देख्यो घूमि नंदनंदन जब, तब सिगरी रिस भाग री।
5सो छवि लखत रही तहँ ठाढ़ी, उमग्यो उर अनुराग री।
6अब उर लाग “कृपालु” आग री, जात जरी गुन आगरी॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं सखियों के साथ वृन्दावन दही बेचने जा रही थी अचानक श्यामसुन्दर ने मेरी दही की मटकी में कंकड़ी मार दी। कंकड़ी लगते ही मेरी मटकी फूट गयी और मुझे क्रोध आया। जनक मैंने घूमकर पीछे की ओर देखा तब उनकी रूप माधुरी से सारा क्रोध समाप्त हो गया। मैं प्रेम-रस-विभोर होकर खड़ी खड़ी इकटक देखती रही और हृदय में श्यामसुन्दर के प्रति अनुराग पैदा हो गया। 'कृपालु' के शब्दों में अब तो उनके वियोग में हृदय में आग सी लग गयी है, जिसमें मैं जली जा रही हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 571