# काँकरि मोरि मारी गागरी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0594-M15-K011
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 11
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 280–281

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>काँकरि मोरि मारी गागरी।  
<a id="line-2"></a>सखि सँग जाति रही दधि बेचन, वृंदावन हौं नागरी।  
<a id="line-3"></a>काँकरि लगत फूटि गइ गागरि, तब मोहिं अति रिस लाग री।  
<a id="line-4"></a>देख्यो घूमि नंदनंदन जब, तब सिगरी रिस भाग री।  
<a id="line-5"></a>सो छवि लखत रही तहँ ठाढ़ी, उमग्यो उर अनुराग री।  
<a id="line-6"></a>अब उर लाग “कृपालु” आग री, जात जरी गुन आगरी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं सखियों के साथ वृन्दावन दही बेचने जा रही थी अचानक श्यामसुन्दर ने मेरी दही की मटकी में कंकड़ी मार दी। कंकड़ी लगते ही मेरी मटकी फूट गयी और मुझे क्रोध आया। जनक मैंने घूमकर पीछे की ओर देखा तब उनकी रूप माधुरी से सारा क्रोध समाप्त हो गया। मैं प्रेम-रस-विभोर होकर खड़ी खड़ी इकटक देखती रही और हृदय में श्यामसुन्दर के प्रति अनुराग पैदा हो गया। 'कृपालु' के शब्दों में अब तो उनके वियोग में हृदय में आग सी लग गयी है, जिसमें मैं जली जा रही हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 571

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
