मिलन-माधुरी · पद 10
कहूँ मैं, कासों मन की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahūṁ maiṁ, kāsoṁ mana kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहूँ मैं, कासों मन की बात।
2मोहिनि-रूप हर्यो मनमोहन, उन बिन जिय घबरात।
3सखियन मनहुँ होत कछु संशय, बातन मोहिं जनात।
4लोक-लाज बैरिनि भइ मोरी, धरूँ धीर केहि भाँत।
5दृग झरि लाय कहत कब देखूँ, सुंदर श्यामल गात।
6उड़न चहत बिनु पंख, पँखेरू, परबस उड़ि न सकात।
7दिन नहिं चैन “कृपालु” एक छिन, काल निशा सम रात॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपने-आप से कहना।) हाय दई! मैं अपने मन की बात किसे बताऊँ? मनमोहन की मनमोहिनी रूपमाधुरी ने मेरे मन को मोहित कर लिया है। अब उनके बिना प्राण अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं। मेरी अंतरंग सखियों के मन में भी मेरे प्रति इस विषय में कुछ शंका-सी उत्पन्न होती जान पड़ती है, उनकी कटी-छटी व्यंग्यभरी बातों से मुझे ऐसा प्रतीत होता है। लोकलज्जा भी मेरी शत्रु बन गयी है। अब भला मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूँ। आँखें आँसुओं की झड़ी लगाती हुई मेरी अलग जान खाये जाती हैं। वे कहती हैं कि हमें इसी क्षण श्यामसुन्दर को दिखाओ। मेरी दशा ठीक वैसी ही है जैसी कि उड़ने के लिये व्याकुल पंखहीन विवश पक्षी की होती है। अब मुझे दिन भर में एक पल को भी चैन नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 570