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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 9

कहहु सखि! वा दिन की कछु बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahahu sakhi! vā dina kī kachhu bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहहु सखि! वा दिन की कछु बात।

2जा दिन निज अँखियन सखि! देखी, सुंदर श्यामल-गात।

3सो-झाँकी झाँकन कहँ सजनी, हमरहुँ जिय ललचात।

4सुनी अनूपम रूप सखिन सों, सबै सराहत जात।

5तू तो लखी सखी! अँखियन ते, कहु सखि कस मुसकात।

6कबहुँ “कृपालु” देखिहौं हौं हूँ, कत इतनो इतरात॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी अपनी अंतरंग सखी से पूछती है कि अरी सखि! उस दिन की बात बता जिस दिन तुमने अपनी आँखों से श्यामसुन्दर को देखा था। उन श्यामसुन्दर की मनोहर झाँकी को देखने के लिए हमारा भी मन ललचा रहा है। मैंने सखियों से सुना है कि उनका रूप अनुपमेय है। सभी सखियाँ उनके रूप की प्रशंसा करती हुई जा रही थीं। तूने तो सखी अपनी आँखों से देखा था। बता तो सही कैसे मुस्कराते हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि इतना क्यों इतरा रही है। कभी मैं भी देखूँगी, तब तुझे भी नहीं बताऊँगी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 569