मिलन-माधुरी · पद 8
कहूँ का, वा दिन की सखि! बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahūṁ kā, vā dina kī sakhi! bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहूँ का, वा दिन की सखि! बात।
2जा दिन देखी नँदनंदन छवि, मंद मंद मुसकात।
3जिन अँखियन देखी सखि! सो छवि, सोऊ कहि न सकात।
4अंग-अंग प्रति रूपमाधुरी, लखि अनंग सकुचात।
5देखतहूँ नहिं देखति सखि! इन, अँखियन जल भरि जात।
6बिनु देखेहूँ सखि! “कृपालु” मोहिं, इक पल कलप लखात॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अंतरंग सखी से अपने प्रथम धुर मिलन की बात बताती हुई कहती है, अरी सखी! उस दिन की क्या बात बताऊँ जिस दिन मैंने श्यामसुन्दर को मन्द मन्द मुस्कराती हुई मनोहर छवि को देखा। मैं तो क्या, जिन आँखों ने उस रूप को देखा है वे भी नहीं बता सकतीं। उनके प्रत्येक अंग का सौन्दर्य कामदेव को लज्जित कर रहा था और फिर मैंने तो सखि, देखते हुए भी नहीं देखा क्योंकि देखते समय इन आँखों में आनन्दाश्रु की धारा बहने लगी थी। कृपालु के शब्दों में बिना देखे भी उनके वियोग में विरहाश्रु बहार्त हुई, एक-एक क्षण कल्प के समान बिता रही हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 568-569