मिलन-माधुरी · पद 7
कहहु सखि, प्रथम-मिलन की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahahu sakhi, prathama-milana kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहहु सखि, प्रथम-मिलन की बात।
2कब देखी? कित देखी सो छवि?, कस देखी मुसकात?।
3कैसो लख्यो रूप सखि! कैसो?, लख्यो रंग सो गात?।
4कैसे नैन? सैन सखि कैसे? कस बैनन बतरात?।
5कैसी चलत चाल सो छलिया, कहहु न? कत इतरात।
6लगति “कृपालु” सगी सखि पुनि कत, मो ते कहत लजात॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अंतरंग सखी से पूछती है कि अपने एवं श्यामसुन्दर के प्रथम मिलन की कुछ बात बताओ। मने उनको कब देखा, कहाँ देखा, कैसे देखा? के वे कैसे मुस्कराते हैं? उनका रूप एवं रंग कैसा है? आँखें एवं कटाक्ष कैसे हैं? वे बोलते कैसे हैं? लते हैं? बताती क्यों नहीं क्यों इतरा रही है? गब्दों में मैं तो तुम्हारी सगी सखी हूँ, फिर तुम मुझ से कहने में क्यों लजा रही हो?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 568