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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 4

इकली जनि जइयो कहुँ गोरी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ikalī jani jaiyo kahuṁ gorī!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1इकली जनि जइयो कहुँ गोरी।

2श्याम सलोना नंद डुठोना,

3टोना करत फिरत ब्रजखोरी।

4नव किशोर सिरमोर छलिन को,

5तू अति भोरी सरल किशोरी।

6जादू, तंत्र, मंत्र सब जानत,

7याते बात मानि लेउ मोरी।

8बिनु बैनन नैनन-सैनन ही,

9बाते लेत नात निज जोरी।

10हा प्राणेश्वर! प्राणनाथ हा,

11कहि कहि भजिहौ इत उत कोरी।

12बनि उनमादिनि नचिहौ गैहौ,

13पीहौ लोक लाज सब घोरी।

14परी ठगोरी सब ब्रज गोरी,

15को “कृपालु” अस जो न ठगो री॥

हिन्दी भावार्थ

(एक चतुर सखी एक भोली-भाली सखी को श्यामसुन्दर के मिलन से रोकती हुई सावधान करती है।) अरी सखी! तू घर से अकेली कहीं भी मत जाना, क्योंकि मैंने सुना है कि नन्दकुमार श्यामसुन्दर ब्रज की गली में घूमता फिरता है एवं जादू किया करता है। वह किशोर अवस्था का है एवं छलियों का सरताज है और तू भी किशोर अवस्था वाली एवं अत्यन्त ही भोली-भाली सरल हृदया है। अरी सखी! वह छलिया विविध प्रकार के जादू, तंत्र, मंत्र आदि सभी कुछ जानता है, अतएव तू मेरी बात पूर्णरूप से मान ले। अरी सखी! बिना कुछ बातचीत किये ही केवल नेत्रों के संकेतों से वह प्रत्येक को सदा के लिए मोहित करके अपनी बना लेता है। कहकर मधुर-मिलन के लिए इधर-उधर पागल की भाँति भागती फिरेगी तथा उन्माद के रोगी को भाँति लोक-लाज को खोकर प्रेम में विभोर होकर निरंतर नाचा करेगी। 'कृपालु नहते हैं कि समस्त ब्रज-गोपियाँ जो भी उसके सम्मुख गईं सको ठगाई में आ चुकी हैं। समस्त ब्रह्माण्डं में ऐसा कोई गी जीवात्मा नहीं है जो उसके समक्ष जाकर पागल न बन गाय।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 564-566