# इकली जनि जइयो कहुँ गोरी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0587-M15-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 277–278

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>इकली जनि जइयो कहुँ गोरी।  
<a id="line-2"></a>श्याम सलोना नंद डुठोना,  
<a id="line-3"></a>टोना करत फिरत ब्रजखोरी।  
<a id="line-4"></a>नव किशोर सिरमोर छलिन को,  
<a id="line-5"></a>तू अति भोरी सरल किशोरी।  
<a id="line-6"></a>जादू, तंत्र, मंत्र सब जानत,  
<a id="line-7"></a>याते बात मानि लेउ मोरी।  
<a id="line-8"></a>बिनु बैनन नैनन-सैनन ही,  
<a id="line-9"></a>बाते लेत नात निज जोरी।  
<a id="line-10"></a>हा प्राणेश्वर! प्राणनाथ हा,  
<a id="line-11"></a>कहि कहि भजिहौ इत उत कोरी।  
<a id="line-12"></a>बनि उनमादिनि नचिहौ गैहौ,  
<a id="line-13"></a>पीहौ लोक लाज सब घोरी।  
<a id="line-14"></a>परी ठगोरी सब ब्रज गोरी,  
<a id="line-15"></a>को “कृपालु” अस जो न ठगो री॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक चतुर सखी एक भोली-भाली सखी को श्यामसुन्दर के मिलन से रोकती हुई सावधान करती है।) अरी सखी! तू घर से अकेली कहीं भी मत जाना, क्योंकि मैंने सुना है कि नन्दकुमार श्यामसुन्दर ब्रज की गली में घूमता फिरता है एवं जादू किया करता है। वह किशोर अवस्था का है एवं छलियों का सरताज है और तू भी किशोर अवस्था वाली एवं अत्यन्त ही भोली-भाली सरल हृदया है। अरी सखी! वह छलिया विविध प्रकार के जादू, तंत्र, मंत्र आदि सभी कुछ जानता है, अतएव तू मेरी बात पूर्णरूप से मान ले। अरी सखी! बिना कुछ बातचीत किये ही केवल नेत्रों के संकेतों से वह प्रत्येक को सदा के लिए मोहित करके अपनी बना लेता है। कहकर मधुर-मिलन के लिए इधर-उधर पागल की भाँति भागती फिरेगी तथा उन्माद के रोगी को भाँति लोक-लाज को खोकर प्रेम में विभोर होकर निरंतर नाचा करेगी। 'कृपालु नहते हैं कि समस्त ब्रज-गोपियाँ जो भी उसके सम्मुख गईं सको ठगाई में आ चुकी हैं। समस्त ब्रह्माण्डं में ऐसा कोई गी जीवात्मा नहीं है जो उसके समक्ष जाकर पागल न बन गाय।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 564-566

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
