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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 5

कछू सखि, कै गयो मो पै आज।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kachhū sakhi! kai gayo mo pai āja

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कछू सखि, कै गयो मो पै आज।

2हौं पनघट-तट गई भरन घट, चट आयो ब्रजराज।

3हौं अनजानी भेद न जानी, जुरे नैन गई लाज।

4नैन-सैन तन मन अरु प्रानन, गह्यो लवा जनु बाज।

5अब हम विकल, न कल इक पल कहँ, लगत न चित घरकाज।

6सागर विरह “कृपालु” बूड़िहौ, न तु चढ़ु आस जहाज॥

हिन्दी भावार्थ

(एक गोपी का प्यारे श्यामसुन्दर से मिलन, एवं सका अपनी सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो मेरे पर प्यारे श्यामसुन्दर ने जादू का सा काम किया है। मैं पनघट पर घड़ा लिए हुए जल भरने गई थी। एकाएक वह नन्दकुमार वहीं पर आ गया। मैं भोली-भाली इस रहस्य को बिल्कुल ही न समझ सकी, इतने में हमारी आँखें श्यामसुन्दर की आँखों से जाकर ऐसी मिल गई कि उन्होंने लोकलाज की परवाह नहीं की। आँखों के कटाक्षपातों ने मेरे तन, मन एवं प्राणों को वैसे ही अपना बना लिया, जैसे कि बाज नामक पक्षी लवा पर झपट्टा मारकर उसे अपने वश में कर लेता है। उसी क्षण से, अरी सखी! मैं अत्यन्त ही व्याकुल हूँ, मुझे एक क्षण को भी चैन नहीं है, एवं घर में भी किसी काम-काज में मन नहीं लगता। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! तू जल्दी ही प्रियतम अवश्य मिलेंगे'इस आशा रूपी जहाज की शरण ले ले, अन्यथा विरह के अगाध समुद्र में डूबकर अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठेगी। अर्थात् पूर्ण विश्वासपूर्वक यह आश रख कि प्रियतम अवश्य मिलेंगे, अन्यथा प्राण निकल जायेंगे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 566-567