# कछू सखि, कै गयो मो पै आज।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0588-M15-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 278–278

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कछू सखि, कै गयो मो पै आज।  
<a id="line-2"></a>हौं पनघट-तट गई भरन घट, चट आयो ब्रजराज।  
<a id="line-3"></a>हौं अनजानी भेद न जानी, जुरे नैन गई लाज।  
<a id="line-4"></a>नैन-सैन तन मन अरु प्रानन, गह्यो लवा जनु बाज।  
<a id="line-5"></a>अब हम विकल, न कल इक पल कहँ, लगत न चित घरकाज।  
<a id="line-6"></a>सागर विरह “कृपालु” बूड़िहौ, न तु चढ़ु आस जहाज॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक गोपी का प्यारे श्यामसुन्दर से मिलन, एवं सका अपनी सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो मेरे पर प्यारे श्यामसुन्दर ने जादू का सा काम किया है। मैं पनघट पर घड़ा लिए हुए जल भरने गई थी। एकाएक वह नन्दकुमार वहीं पर आ गया। मैं भोली-भाली इस रहस्य को बिल्कुल ही न समझ सकी, इतने में हमारी आँखें श्यामसुन्दर की आँखों से जाकर ऐसी मिल गई कि उन्होंने लोकलाज की परवाह नहीं की। आँखों के कटाक्षपातों ने मेरे तन, मन एवं प्राणों को वैसे ही अपना बना लिया, जैसे कि बाज नामक पक्षी लवा पर झपट्टा मारकर उसे अपने वश में कर लेता है। उसी क्षण से, अरी सखी! मैं अत्यन्त ही व्याकुल हूँ, मुझे एक क्षण को भी चैन नहीं है, एवं घर में भी किसी काम-काज में मन नहीं लगता। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! तू जल्दी ही प्रियतम अवश्य मिलेंगे'इस आशा रूपी जहाज की शरण ले ले, अन्यथा विरह के अगाध समुद्र में डूबकर अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठेगी। अर्थात् पूर्ण विश्वासपूर्वक यह आश रख कि प्रियतम अवश्य मिलेंगे, अन्यथा प्राण निकल जायेंगे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 566-567

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
