मिलन-माधुरी · पद 3
आजु सखि! ह्वै गये नैना चार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju sakhi! hvai gaye nainā chāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु सखि! ह्वै गये नैना चार।
2हौं दधि बेचन जाति वृंदावन, देख्यों नंदकुमार।
3सो छवि लखत बनत, नहिं वरनत, रूप-माधुरी-सार।
4तन-मन-प्रान निछावरि करि मैं, लियो मोल रिझवार।
5पुनि-पुनि कह्यो"हमारी प्यारी"सुनि-सुनि गइ बलिहार।
6कत “कृपालु” बलि जात नंद को, कै गयो बंटाढार॥
हिन्दी भावार्थ
(एक गोपी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मिलन पूवं उसकी अपनी सहेली से बातचीत।) अरी सखी! आज मैं वृन्दावन की ओर दही बेचने जा रही थी। ही मार्ग में प्यारे श्यामसुन्दर दिखाई पड़े और उनकी आँखों से हमारी आँखें चार हो गईं। अरी सखी! ही बनती थी, वर्णन करने में नहीं आ सकती। की मधुरता का सार निकालकर वह छवि बनी हुई हो। उस छवि पर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व न्यौछावर करके सदा के लिए उनकी बन गई। प्यारी', ऐसा कहा। मैं इस शब्द को सुनकर प्रेम में विभोर हो गई। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! अधिक आनन्द में मग्न हो रही है, उस छलिया नन्दकुमार ने तो तेरा लोक-परलोक सभी चौपट कर दिया, क्योंकि अब तू सदा ही उसके मधुर-मिलन के लिए तड़पा करेगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 563-564