# आजु सखि! ह्वै गये नैना चार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0586-M15-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 277–277

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>आजु सखि! ह्वै गये नैना चार।  
<a id="line-2"></a>हौं दधि बेचन जाति वृंदावन, देख्यों नंदकुमार।  
<a id="line-3"></a>सो छवि लखत बनत, नहिं वरनत, रूप-माधुरी-सार।  
<a id="line-4"></a>तन-मन-प्रान निछावरि करि मैं, लियो मोल रिझवार।  
<a id="line-5"></a>पुनि-पुनि कह्यो"हमारी प्यारी"सुनि-सुनि गइ बलिहार।  
<a id="line-6"></a>कत “कृपालु” बलि जात नंद को, कै गयो बंटाढार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक गोपी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मिलन पूवं उसकी अपनी सहेली से बातचीत।) अरी सखी! आज मैं वृन्दावन की ओर दही बेचने जा रही थी। ही मार्ग में प्यारे श्यामसुन्दर दिखाई पड़े और उनकी आँखों से हमारी आँखें चार हो गईं। अरी सखी! ही बनती थी, वर्णन करने में नहीं आ सकती। की मधुरता का सार निकालकर वह छवि बनी हुई हो। उस छवि पर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व न्यौछावर करके सदा के लिए उनकी बन गई। प्यारी', ऐसा कहा। मैं इस शब्द को सुनकर प्रेम में विभोर हो गई। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! अधिक आनन्द में मग्न हो रही है, उस छलिया नन्दकुमार ने तो तेरा लोक-परलोक सभी चौपट कर दिया, क्योंकि अब तू सदा ही उसके मधुर-मिलन के लिए तड़पा करेगी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 563-564

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
