लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 2

आज सखि, गिरी शीश पै गाज।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āja sakhi, girī shīsha pai gāja

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1आज सखि, गिरी शीश पै गाज।

2तट-पनघट घट भरन गई रहि, सँग रह सखिन समाज।

3आय अचानक रवि-तनया-तट, टेर्यो मोहिं ब्रजराज।

4टेरि कही"सखि! तोहिं ललिता सखि, द्रुत बुलाय कछु काज"।

5हौं जब चली अली! तब छलिया, चल्यो संग बिनु लाज।

6इकली जानि लगाय लियो उर, मोहिं छलियन सरताज।

7नहिं “कृपालु” तब ते कल इक पल, लाजहुँ निगुरी भाज॥

हिन्दी भावार्थ

(एक बड़भागिनी का भगवान् से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपनी व्यक्तिगत सखी से उसे व्यक्त करना-) अरी सखी! आज तो मेरे सिर पर ही वज्रपात हो गया। आज मैं अपनी सहेलियों के साथ पनघट पर पानी भरने गयी थी। इतने में ही अचानक यमुना के किनारे खड़े हुए उस नटखट ने मुझे पुकारा और कहा-''अरी सखि! किसी परमावश्यक कार्य से तुझे ललिता ने तुरन्त बुलाया है''। मैं विश्वास कर के चल दी और वह छलिया भी निर्लज्ज होकर मेरे साथ हो लिया। मार्ग में उसने अकेली पाकर बरबस मेरा आलिंगन कर लिया। 'कृपालु' के शब्दों में अरी सखि! तब से एक क्षण को भी चैन नहीं है एवं निर्लज्ज लज्जा ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 563