मिलन-माधुरी · पद 1
अरी सखि!, किरिकिरि आँखि परी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi!, kirikiri āṁkhi parī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी सखि!, किरिकिरि आँखि परी।
2जब ते परी किरिकिरी तबते, नींदिहुँ गई भग री।
3कोटि यतन करि करि हौं हारी, तबहूँ नहिं निकरी।
4अब मोहिं कल ते परत न कहुँ कल, पल-छिन एक घरी।
5करहु तुमहिं उपचार सखी! कछु, नैननि लाग झरी।
6हौं “कृपालु” जानत हौं नीके, यह किरिकिरी"हरी"॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अंतरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! मेरी आँख में तो किरकिरी सी पड़ गयी है। जब से वह किरकिरी पड़ी है तभी से नींद भी नहीं आती। मैं करोड़ों प्रयत्न कर चुकी किन्तु यह किरकिरी नहीं निकलती। कल से मुझे एक क्षण के लिए कहीं भी चैन नहीं मिलता। अरी सखी! आँखों में वर्षा-ऋतु लगी है। तू ही कुछ उपाय कर। 'कृपालु के शब्दों में अंतरंग सखी ने कहा कि मैं भली-भाँति जानती हूँ कि यह किरकिरी श्यामसुन्दर ही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 562-563