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RADHEY RADHEY

निकुंज-माधुरी · पद 29

सखी! ये भ्रमर निकर भरमाये।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ye bhramara nikara bharamāye

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! ये भ्रमर निकर भरमाये।

2रति-रस-सरस-रास-मंडल पर, जानि सरोवर धाये।

3जानि सुविस्तृत श्वेत वस्त्र कहँ, निर्मल जल मनभाये।

4ता बिच लाल गाल गोपिन जनु, लाल कमल दरसाये।

5तैसेहिं नील गाल लालहिं जनु, नील कमल छवि छाये।

6चपल नैन जनु मीन, विभूषण, धुनि खग बैन जनाये।

7इमि “कृपालु” जुरि भृंगनि पुंजनि, गुंजन करि मँडराये॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी अपनी अंतरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! देख तो, इन समस्त भौंरों को भ्रम हो गया है। इन भौरों ने प्रेम-रस मंडित रासमण्डल को साक्षात् सरोवर समझ लिया है। निछी हुई विस्तृत सफेद वस्त्र की चाँदनी को निर्मल जल समझ कर घेरे हुए हैं एवं उसके बीच में विद्यमान करोड़ो गोपियों के लाल रंग के गालों को साक्षात् लाल कमल समझ लिया है। इसी प्रकार श्यामसुन्दर के नीले गालों को देखकर उन्हें सचमुच ही नीले कमल समझ लिया है। करोड़ों सखियो एवं करोड़ों श्यामसुन्दर के चंचल नेत्रों को भौंरों ने सचमुच ही मछलियों का झुण्ड समझ लिया है एवं उन सब के आभूषणो की ध्वनियों को पक्षियों का शब्द समझ लिया है। कृपालु कहते हैं कि इस प्रकार भौंरों के झुण्ड के झुण्ड अपने ही भ्रम के कारण मधुर-मधुर गुंजार करते हुए रास मण्डल पर मँडरा रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 560-561