निकुंज-माधुरी · पद 28
सखी! दोउ, झूलत मृदु मुसकात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! dou, jhūlata mṛidu musakāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! दोउ, झूलत मृदु मुसकात।
2ज्योँ सखि! गगन मगन मन घनगन, घनन-घनन घननात।
3त्योँ सखि! इत घनश्याम मगन मन, झूलत गावत जात।
4ज्योँ सखि! घन सँग चपल चंचला, चम-चम-चम चमकात।
5त्योँ सखि! श्यामा संग श्याम इत, रहि-रहि हिय हुलसात।
6पै चपला सचला इत अचला, लली, लाल सँग भात।
7लखत “कृपालु” झुलन झाँकी बस, मुख कछु कहि न सकात॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखी! श्यामा-श्याम मधुर-मधुर मुस्कराते हुए झूल रहे हैं। जिस प्रकार आकाश में घने बादल आनन्द व्रिभोर होकर घनन, ऐसी धुनि में गरजते हैं उसी प्रकार श्यामसुन्दर भी आनन्द विभोर होकर झूलते हुए गाते जाते हैं जिस प्रकार बादल के साथ चंचल बिजली चम चम चम चम चमकती है उसी प्रकार श्यामसुन्दर के साथ किशोरी जी भी रह-रहकर आनन्दमग्न होती हैं। किन्तु उधर बिजली चंचल है इधर श्यामसुन्दर रूपी घन के साथ किशोरी जी निश्चल हैं। कृपालु' कहते हैं कि झूलने की झाँकी तो बस देखते ही बनती है, मुख से उसका वर्णन नहीं हो सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 560