निकुंज-माधुरी · पद 27
श्याम तुम! रसिकन नाम लजायो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma! tuma rasikana nāma lajāyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम तुम! रसिकन नाम लजायो।
2सब दिन ग्वार गँवारन सँग लै, वन वन ढोर चरायो।
3वेणी गुहत, केश उरझावत, किन गुरु तोहिं सिखायो।
4लखि सखियन हँसिहैं बस करु हटु, लट छूटी मोहिं भायो।
5कुसुम-गुच्छ इमि धरत शीश जनु, शिव प्रतिमाहिं चढ़ायो।
6व्यजन करत पुनि गिरत कुसुम जनु, झंझावात चलायो।
7धनि “कृपालु” तुम रसिक शिरोमणि, धनि जिन तोहिं निभायो॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुमने रसिकों का नाम लज्जित कर दिया। सारे दिन तो अशिक्षित ग्वालों के साथ वनों में जा-जाकर गायों को चराया, तुममें रसिकता कहाँ से आयी। किशोरी जी कहती हैं कि तुम वेणी गूँथते हुए बालों को उलझा रहे हो। इस प्रकार की गूँथने की क्रिया तुमने किस गुरु से सीखी। बस करो, दूर बैठो, नहीं तो कोई सखी देख लेगी तो हम दोनों की हँसी बनायेगी। मुझे खुले बाल ही अच्छे लगते हैं। तुम तो मेरे सिर पर फूलों के गुच्छे इस प्रकार रखते हो जैसे कोई शिवजी की मूर्ति पर चढ़ा रहा हो। फिर पंखा भी इतने वेग से झलते हो, मानो आँधी चल रही हो, जिससे सब फूल गिर जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम सरीखे ग्रामीण भी रसिक-शिरोमणि कहलाने का दावा करते हैं। धन्य है तुमको एवं धन्य है उन किशोरी जी को, जिन्होंने तुम्हें इस प्रकार निभा लिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 559