निकुंज-माधुरी · पद 26
लख्यों इक अचरज कुंज मझार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhyoṁ ika acharaja kuñja majhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लख्यों इक अचरज कुंज मझार।
2पिय पूछत प्यारी ते"कित गये, पिय मम प्राणाधार"।
3प्यारी पूछति पिउ ते,"कित गइँ, प्यारी मम सुकुमार"।
4पिवु कह प्यारिहिं"को प्यारी तव", सो कह"भानुदुलार"।
5प्यारी कह पिउ ते"को पिउ तव"? पिउ कह"नंदकुमार"।
6सखि समुझाय हारि गई पै नहिं, समुझत दोउ सरकार।
7कह “कृपालु” दोउ अति अचरज ते, एकहिं एक निहार॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखी! आज कुंज में एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा। प्यारी के प्रेम में समाधिस्थ प्रियतम प्यारी जी से पूछ रहे हैं कि मेरे प्रियतम-प्राणाधार कहाँ चले गये? इसी प्रकार प्रियतम के प्रेम में समाधिस्थ प्यारी जी प्रियतम से पूछती हैं-''हमारी सुकुमारी प्यारी कहाँ चली गयी?''उसी समाधिस्थ अवस्था में प्यारी जी प्रियतम से पूछती हैं-''तुम्हारे प्रियतम कौन हैं''? प्रियतम उत्तर देते हैं-'नन्दकुमार हैं '। उसी समाधिस्थ अवस्था में प्रियतम प्यारी जी से पूछते हैं कि तुम्हारी प्यारी कौन है? प्यारी जू उत्तर देती हैं-'भानुदुलारी हैं '। सखियों ने युगल-सरकार को चेतना में लाने के अनेक प्रयत्न किये किन्तु सर्वथा असफल रहीं। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे बाँकी झाँकी तो वह है जब दोनों अत्यन्त आश्चर्य-भरी दृष्टि से एक दूसरे को देखते हैं और सोचते हैं कि प्रियतम गौरवर्ण के कैसे हैं एवं प्यारी जी नीलवर्ण की कैसे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 558