निकुंज-माधुरी · पद 25
लखो री आली! लाली जु कि झुलन बहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakho rī ālī! lālī ju ki jhulana bahāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखो री आली! लाली जु कि झुलन बहार।
2झुलवत लाल रूप जनु, लाली, झूलत जनु सिंगार।
3हिय फूली कालिंदी, ता तट, फूली कदमनि डार।
4ता पर लता-बेलि बहु फूली, उरझी तरुवर झार।
5रंग बिरंगे विविध सुफूलनि, रेशम डोर सँवार।
6किय सोरह श्रृंगार फुलन को, राजति भानुदुलार।
7झुकि झुकि झोंटे देत लाल जू, करन चहत दृग चार।
8मुरि मुरि मृदु मुसकाय लाड़ली, करति नैन सोँ वार।
9लाल अलापत तान, लाड़ली, गावति मेघ मलार।
10अति द्रुत झोंटे दियो लाल जब, डरपीं हिय सुकुमार।
11कह्यो लाड़ली"करु न लँगरई, नटखट नंदकुमार"।
12"हौं “कृपालु” तब ही मानौं जब, सँग झुलवो रिझवार"॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि अरी सखी! आज वृषभानुदुलारी को झूले की बहार तो देख! लाल जी मूर्तिमान् रूप के समान झूला झुला रहे हैं तथा लाड़िली जी साक्षात् शृंगार के समान झूल रहीं हैं। श्रीयमुना जी आनंद में फूली नहीं समा रही हैं तथा यमुना के किनारे कदंब का वृक्ष भी फूलों से सुशोभित हो रहा है एवं उस कदंब के वृक्ष में पूर्णतया लिपटी हुई अनेक रंग के फूलों से युक्त लतायें उलझी हुई हैं। अनेक रंग के फूलों से सजाई हुई झूले की रेशमी रस्सी शोभायमान हो रही है। झूले के ऊपर श्रीराधिका जी फूलों के सोलहों शृंगार से युक्त होकर विराजमान हैं। लाल जी झुक झुककर झूमते हुए पीछे से झूले में झोटे दे रहे हैं एवं किशोरी जी की आँखों से आँखें मिलाने का प्रयत्न भी कर रहे हैं। किशोरी जी भी मुड़-मुड़कर पीछे की ओर देखती हुई श्यामसुन्दर पर कटाक्षपात् कर रही हैं। लाल जी तान आलाप लेते हैं एवं लाड़िली जी मेघमल्हार राग से गाना गाती हैं! कुछ देर बाद लालजी ने ज्यों ही जोरों से झॉटे दिये तब लाड़िली जी परम सुकुमार होने के कारण, डर गयीं। किशोरी जी ने लाल जी से कहा, 'अरे नटखट! ऊधम न करो।''कृपालु' कहते हैं कि तब लाल जी ने कहा कि मैं यह ऊधम तभी बंद करूँगा जब तुम मुझे भी अपने पास बिठाकर झूलने की आज्ञा प्रदान करोगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 556-557