निकुंज-माधुरी · पद 24
युगलवर, भीजत कुंज मझार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, bhījata kuñja majhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, भीजत कुंज मझार।
2श्यामा श्याम लतन तर ठाढ़े, रिमझिम परत फुहार।
3प्यारी सिर पटपीत ओट कर, प्रीतम नंदकुमार।
4उत प्यारे सिर सुरँग चूनरिन, ओट करति सुकुमार।
5"तुम जनि ओट करहु"कह दोऊ, दोऊ सोँ बलिहार।
6गहि रस रीति प्रीति दोउ झगरत, गौर श्याम सरकार।
7लखत “कृपालु” शंभु यह झाँकी, छुपि गोपी तनु धार॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामा श्याम युगल सरकार कुंज के बीच में भीग रहे हैं। दोनों ही लताओं के नीचे खड़े हैं, ऊपर से रिमझिम रिमझिम पानी की फुहार पड़ रही है। इधर तो प्रियतम श्यामसुन्दर किशोरी जी के सिर पर फुहार को रोकने के लिए पीताम्बर की ओट करते हैं, उधर सुकुमारी किशोरी जी भी श्यामसुन्दर के सिर पर फुहार को रोकने के लिये अपनी सुरंग चूनरि की ओट करती हैं। रस वैलक्षण्य यह है कि दोनों ही दोनों से प्रेम की अतिशयता में कहते हैं "तुम ओट मत करो'इस झाँकी पर मैं बलिहार जाता हूँ। इस प्रकार प्रेम रस की रीति का अवलम्बन करके श्यामा-श्याम परस्पर झगड़ रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस मनोहर झाँकी को गोपी शरीर धारण करके छिपकर भगवान् शंकर देख रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 555-556