निकुंज-माधुरी · पद 23
युगलवर, निरतत कुंज मझार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, niratata kuñja majhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, निरतत कुंज मझार।
2देखति ललितादिक सखियन सब, पुनि-पुनि कहि बलिहार।
3आजु होड़ परि गई निरत महँ, युगल नवल सरकार।
4विविध अंग बहु भेद संग दोउ, हाव-भाव-विस्तार।
5निरतत गति अविराम गौर-हरि, हार-जीत उर धार।
6तब ललिता सखि उठि कह"बस करु, नाचत दोउ इकसार"।
7दोउ “कृपालु” कह"पक्षपात यह, ये गई, ये गये हार"॥
हिन्दी भावार्थ
युगल सरकार कुंज में नृत्य कर रहे हैं। ललितादिक सखियाँ बार-बार बलिहार! बलिहार! कह-कहकर विभोर हो रही हैं। आज नृत्य में श्यामा-श्याम में परस्पर होड़ पड़ गयी है। दोनों ही अनेक अंगों के अनेक भेदों द्वारा अनेक हाव-भाव दिखा रहे हैं। अपनी-अपनी विजय कामना से श्यामा श्याम अविराम गति से नृत्य कर रहे हैं। तब ललिता सखी ने कहा-अब युगल सरकार नृत्य बन्द कर दें, दोनों ही एक समान नाचते हैं। 'कृपालु' के शब्दों में दोनों ने ही ललिता के न्याय को पक्षपातपूर्ण बताया और एक-दूसरे के प्रति यह कहा-''हम जीत गये, ये हार गयीं''।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 555