निकुंज-माधुरी · पद 22
युगलवर, निरतत कुंज कुटीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, niratata kuñja-kuṭīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, निरतत कुंज कुटीर।
2छिटकि रही चहुँ चारु चाँदनी, कालिंदी के तीर।
3विकसित-मुकुलित, कुसुम-कलिन पर, भई अलिन की भीर।
4शीतल मंद सुगंध पवन बह, कलरव केकी कीर।
5हास-विलास-रास-रस खेलत, झूमत प्रेम अधीर।
6होत “कृपालु” सुमिरि सो झाँकी, पुलकित सकल शरीर॥
हिन्दी भावार्थ
प्रिया-प्रियतम लताओं के कुंजगृहों में नृत्य कर रहे हैं। चारों ओर पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणें फैल रही हैं। यमुना का किनारा है एवं खिले हुए फूलों तथा अर्ध-विकसित कलियों पर भौरों का झुंड मँडरा रहा है। शीतल, मन्द, सुगन्धित वायु बह रही है, एवं मोर तथा तोते मधुर ध्वनि बोल रहे हैं। श्यामा-श्याम प्रेम में विभोर होकर झूमते हुए विविध प्रकार के अन्तरंग दिव्य रास-विलास की क्रीड़ाएँ कर रहे हैं। "कृपालु कहते हैं कि उस दिव्य झाँकी का स्मरण करने मात्र से सारा शरीर पुलकायमान हो जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 554