# युगलवर, निरतत कुंज कुटीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0576-M14-K022
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: निकुंज-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 22
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 271–271

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>युगलवर, निरतत कुंज कुटीर।  
<a id="line-2"></a>छिटकि रही चहुँ चारु चाँदनी, कालिंदी के तीर।  
<a id="line-3"></a>विकसित-मुकुलित, कुसुम-कलिन पर, भई अलिन की भीर।  
<a id="line-4"></a>शीतल मंद सुगंध पवन बह, कलरव केकी कीर।  
<a id="line-5"></a>हास-विलास-रास-रस खेलत, झूमत प्रेम अधीर।  
<a id="line-6"></a>होत “कृपालु” सुमिरि सो झाँकी, पुलकित सकल शरीर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रिया-प्रियतम लताओं के कुंजगृहों में नृत्य कर रहे हैं। चारों ओर पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणें फैल रही हैं। यमुना का किनारा है एवं खिले हुए फूलों तथा अर्ध-विकसित कलियों पर भौरों का झुंड मँडरा रहा है। शीतल, मन्द, सुगन्धित वायु बह रही है, एवं मोर तथा तोते मधुर ध्वनि बोल रहे हैं। श्यामा-श्याम प्रेम में विभोर होकर झूमते हुए विविध प्रकार के अन्तरंग दिव्य रास-विलास की क्रीड़ाएँ कर रहे हैं। "कृपालु कहते हैं कि उस दिव्य झाँकी का स्मरण करने मात्र से सारा शरीर पुलकायमान हो जाता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 554

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
