निकुंज-माधुरी · पद 21
युगलवर, झूलें कुंज मझार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, jhūleṁ kuñja majhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, झूलें कुंज मझार।
2श्री वृषभानुदुलारी प्यारी, प्रियतम नंदकुमार।
3बह्यो जात रस-सुधा-माधुरी, छवि-निधि-सिंधु अपार।
4मृदु मुसकात, झूमि झुकि झूलत, जनु दोउ रूप सिंगार।
5बिनु वानी बतरात परस्पर, दुहुँन दृगन दृग डार।
6कहि न जात बड़भाग विटप को, बड़भागिनि वह डार।
7जो निज गल बंधन दै झुलवति, युगल-नवल-सरकार।
8होत मगन दोउ यमुना जल बिच, निज प्रतिबिंब निहार।
9लली लाल के या झूलन पर, हम “कृपालु” बलिहार॥
हिन्दी भावार्थ
लाड्ली-लाल युगल-सरकार झूला झूल रहे हैं। श्री वृषभानु की बेटी एवं नंद के लाल दोनों ही दिव्य प्रेमरस के अमृत को बरसा रहे हैं। दोनों मधुर मुस्कान के साथ झूमते हुए झुक-झुककर झूल रहे हैं, मानो रूप और श्रृंगार साक्षात् स्वरूप धारण करके आये हों। बिना वाणी के ही -आँखों-में आँखें डालकर संकेत से ही परस्पर बातें करते हैं। उस वृक्ष एवं उस डाली के भाग्य की सराहना भला कौन कर सकता है अपने गले में फाँसी डालकर प्रिया-प्रियतम को झुला रही है। दोनों ही झूलते हुए यमुना के जल में परस्पर अपनी-अपनी परछाई देखकर अत्यन्त ही आनन्द-विभोर हो रहे हैं। "कृपालु कहते हैं कि लाड़िली लाल की इस मधुर झूला-लीला की मैं बार-बार बलैया लेता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 553-554