# युगलवर, झूलें कुंज मझार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0575-M14-K021
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: निकुंज-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 21
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 270–271

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>युगलवर, झूलें कुंज मझार।  
<a id="line-2"></a>श्री वृषभानुदुलारी प्यारी, प्रियतम नंदकुमार।  
<a id="line-3"></a>बह्यो जात रस-सुधा-माधुरी, छवि-निधि-सिंधु अपार।  
<a id="line-4"></a>मृदु मुसकात, झूमि झुकि झूलत, जनु दोउ रूप सिंगार।  
<a id="line-5"></a>बिनु वानी बतरात परस्पर, दुहुँन दृगन दृग डार।  
<a id="line-6"></a>कहि न जात बड़भाग विटप को, बड़भागिनि वह डार।  
<a id="line-7"></a>जो निज गल बंधन दै झुलवति, युगल-नवल-सरकार।  
<a id="line-8"></a>होत मगन दोउ यमुना जल बिच, निज प्रतिबिंब निहार।  
<a id="line-9"></a>लली लाल के या झूलन पर, हम “कृपालु” बलिहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

लाड्ली-लाल युगल-सरकार झूला झूल रहे हैं। श्री वृषभानु की बेटी एवं नंद के लाल दोनों ही दिव्य प्रेमरस के अमृत को बरसा रहे हैं। दोनों मधुर मुस्कान के साथ झूमते हुए झुक-झुककर झूल रहे हैं, मानो रूप और श्रृंगार साक्षात् स्वरूप धारण करके आये हों। बिना वाणी के ही -आँखों-में आँखें डालकर संकेत से ही परस्पर बातें करते हैं। उस वृक्ष एवं उस डाली के भाग्य की सराहना भला कौन कर सकता है अपने गले में फाँसी डालकर प्रिया-प्रियतम को झुला रही है। दोनों ही झूलते हुए यमुना के जल में परस्पर अपनी-अपनी परछाई देखकर अत्यन्त ही आनन्द-विभोर हो रहे हैं। "कृपालु कहते हैं कि लाड़िली लाल की इस मधुर झूला-लीला की मैं बार-बार बलैया लेता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 553-554

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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