निकुंज-माधुरी · पद 20
युगलवर, झूलें कुंज कुटीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, jhūleṁ kuñja kuṭīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, झूलें कुंज कुटीर।
2नथवारी प्यारी अरु प्यारो, मुरली वारो वीर।
3झूला डर्यो कदंबनि डारन, कालिंदी के तीर।
4श्यामा झूलति श्याम झुलावत, ह्वै रस प्रेम अधीर।
5गावति मेघ मलार अलिन मिलि, पुलकित सकल शरीर।
6लखत “कृपालु” शंभु सनकादिक, धरि तनु शुक, पिक, कीर॥
हिन्दी भावार्थ
नथ वाली भानुदुलारी एवं मुरली वाले श्यामसुन्दर गा झूला झूल रहे हैं। यमुना के किनारे कदम्ब की डाल पर झूला पड़ा हुआ है। प्रेमरस में मग्न होकर श्यामसुन्दर किशोरी जी को झुला रहे हैं। सखियाँ मिलकर मेघ मल्हार गा रही हैं एवं आनन्द के मारे उनका शरीर पुलकायमान हो रहा है। कृपालु' कहते हैं कि इस बाँकी झाँको को शम्भु सनकादिक परमहँस, तोते, कोकिल एवं तोते आदि का शरीर धारण करके देख रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 552-553