निकुंज-माधुरी · पद 19
युगलवर, झूलनि की बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, jhūlani kī balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, झूलनि की बलिहार।
2नागरि अरु नागर झुकि झूमत, भल गलबाँहीं डार।
3उमड़ि घुमड़ि घन गरजत चमकति, चपला बारम्बार।
4पंचम सुर सों तान अलापति, गावति सखिन मलार।
5गावत ही घन बरसन लागे, भीजत दोउ सरकार।
6धनि “कृपालु” सो बाँकी झाँकी, धनि जिन ताहि निहार॥
हिन्दी भावार्थ
युगल सरकार के झूलने पर मैं बलिहार जाता हूँ। श्यामा श्याम गलबाहीं दिये हुए झुक-झुककर झूल रहे हैं उमड़ घुमड़ कर बादल गरज रहे हैं एवं बार-बार बिजली चमक रही है। सखियाँ मल्हार गाती हुई पंचम स्वर से तान अलाप रही हैं। मल्हार राग गाते ही बादल बरसने लगे, जिससे श्यामा श्याम भीग रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि युगल सरकार की इस सुन्दर झाँकी को धन्य है एवं इस झाँकी के देखने वालों को और भी धन्य है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 552