निकुंज-माधुरी · पद 12
देखु सखि! दोउ रस रंग भरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! dou rasa raṅga bhare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखु सखि! दोउ रस रंग भरे।
2झूलें श्याम गौर दोउ झूले, डार कदंब डरे।
3अति बाँकी झाँकी सो दोउन, डारे बाँह गरे।
4ललिता सखी झुलावति झूला, झूला पाणि धरे।
5लाल अलापत, लाड़लि गावत, सखियन तान भरे।
6लखत “कृपालु” हमहुँ यह झाँकी, मंजु निकुंज खरे॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखी! आज श्यामा-श्याम निकुंज के रस रंग में भरे हैं। देख तो कदम्ब को डाल में झूला पड़ा है एवं दोन झूल रहे हैं। गलबाहीं डाले हुए दोनों कितने सुन्दर लग रहे हैं ललिता सखी झूले को हाथ से पकड़ कर प्रिया-प्रियतम व झुला रही हैं। श्यामसुन्दर आलाप रहे हैं, श्री किशोरी जी गाः हैं तथा सखियाँ तान लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि सुन्द लताकुंज में खड़े होकर इस मनोरम झाँकी को हम भी निहार रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 546-547