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RADHEY RADHEY

निकुंज-माधुरी · पद 13

देखु सखि! सावन मास बहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! sāvana māsa bahāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1देखु सखि! सावन मास बहार।

2नवल निकुंज-मंजु बिच झूलत, नवल युगल सरकार।

3पकरे दोउ इक-इक कर डोरिन, इक-इक कर गर डार।

4दोउ दें झोंटे झूमि-झूमि झुकि, एकहिं एक निहार।

5फहरत नील पीत पट अंचल, चंचल लट घुँघरार।

6गावत राग मलार दुहुँन मिलि, अलि कर स्वर-विस्तार।

7सखिन बजावति बीन वेनु कोउ, सब प्रवीन इक-सार।

8लखि “कृपालु” कह"दोउ मम ठाकुर, जय हो जय बलिहार"॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखी! सावन के महीने की झूले की बहार देख। युगल सरकार सुन्दर नवीन निकुंज में झूला झूल रहे हैं। एक-एक हाथ में दोनों झूले की रस्सी पकड़े हुए हैं एवं एक-एक हाथ एक दूसरे के गले में डाले हुए हैं। दोनों प्रेम-विभोर होकर एक साथ एक-दूसरे को देखते हुए झूम-झूम कर, झुक-झुककर चरणों से झोंटे दे रहे हैं। किशोरी जी का नीलाम्बर एवं श्यामसुन्दर का पीताम्बर फहरा रहा है एवं दोनों की चंचल घुँघराली लटें लहरा रही हैं। दोनों मिलकर मल्हार राग में झूला गा रहे हैं, एवं सखियाँ तान आलाप ले रही हैं। एक से एक श्रेष्ठ वाद्य में पारंगत गोपांगनायें, वीणा, वेणु आदि विविध वाद्य बजा रही हैं। उपर्युक्त झाँकी को देखकर 'कृपालु' ने कहा ''हमारे दोनों सरकार की जय हो! जय हो! बलिहार! बलिहार''।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 547-548