# देखु सखि! सावन मास बहार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0567-M14-K013
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: निकुंज-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 13
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 267–267

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>देखु सखि! सावन मास बहार।  
<a id="line-2"></a>नवल निकुंज-मंजु बिच झूलत, नवल युगल सरकार।  
<a id="line-3"></a>पकरे दोउ इक-इक कर डोरिन, इक-इक कर गर डार।  
<a id="line-4"></a>दोउ दें झोंटे झूमि-झूमि झुकि, एकहिं एक निहार।  
<a id="line-5"></a>फहरत नील पीत पट अंचल, चंचल लट घुँघरार।  
<a id="line-6"></a>गावत राग मलार दुहुँन मिलि, अलि कर स्वर-विस्तार।  
<a id="line-7"></a>सखिन बजावति बीन वेनु कोउ, सब प्रवीन इक-सार।  
<a id="line-8"></a>लखि “कृपालु” कह"दोउ मम ठाकुर, जय हो जय बलिहार"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखी! सावन के महीने की झूले की बहार देख। युगल सरकार सुन्दर नवीन निकुंज में झूला झूल रहे हैं। एक-एक हाथ में दोनों झूले की रस्सी पकड़े हुए हैं एवं एक-एक हाथ एक दूसरे के गले में डाले हुए हैं। दोनों प्रेम-विभोर होकर एक साथ एक-दूसरे को देखते हुए झूम-झूम कर, झुक-झुककर चरणों से झोंटे दे रहे हैं। किशोरी जी का नीलाम्बर एवं श्यामसुन्दर का पीताम्बर फहरा रहा है एवं दोनों की चंचल घुँघराली लटें लहरा रही हैं। दोनों मिलकर मल्हार राग में झूला गा रहे हैं, एवं सखियाँ तान आलाप ले रही हैं। एक से एक श्रेष्ठ वाद्य में पारंगत गोपांगनायें, वीणा, वेणु आदि विविध वाद्य बजा रही हैं। उपर्युक्त झाँकी को देखकर 'कृपालु' ने कहा ''हमारे दोनों सरकार की जय हो! जय हो! बलिहार! बलिहार''।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 547-548

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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