# देखु सखि! दोउ रस रंग भरे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0566-M14-K012
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: निकुंज-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 12
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 267–267

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>देखु सखि! दोउ रस रंग भरे।  
<a id="line-2"></a>झूलें श्याम गौर दोउ झूले, डार कदंब डरे।  
<a id="line-3"></a>अति बाँकी झाँकी सो दोउन, डारे बाँह गरे।  
<a id="line-4"></a>ललिता सखी झुलावति झूला, झूला पाणि धरे।  
<a id="line-5"></a>लाल अलापत, लाड़लि गावत, सखियन तान भरे।  
<a id="line-6"></a>लखत “कृपालु” हमहुँ यह झाँकी, मंजु निकुंज खरे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखी! आज श्यामा-श्याम निकुंज के रस रंग में भरे हैं। देख तो कदम्ब को डाल में झूला पड़ा है एवं दोन झूल रहे हैं। गलबाहीं डाले हुए दोनों कितने सुन्दर लग रहे हैं ललिता सखी झूले को हाथ से पकड़ कर प्रिया-प्रियतम व झुला रही हैं। श्यामसुन्दर आलाप रहे हैं, श्री किशोरी जी गाः हैं तथा सखियाँ तान लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि सुन्द लताकुंज में खड़े होकर इस मनोरम झाँकी को हम भी निहार रहे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 546-547

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
