निकुंज-माधुरी · पद 11
देखु सखि! झूलत श्यामा श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! jhūlata shyāmā shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखु सखि! झूलत श्यामा श्याम।
2झूलत श्यामा श्याम, झुलावति, ललितादिक ब्रजबाम।
3गरबाहीं दीने रस भीने, छीने छवि शत काम।
4झुकि-झुकि झूमि-झूमि दोउ झूलत, प्रेम रूप रस-धाम।
5मुरली मधुर बजावत गावत, राग मलार ललाम।
6हिय फूली “कृपालु” कालिंदिहुँ, छुवति तरंगनि पाम॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! देख तो, श्यामा श्याम झूला झूल रहे हैं एवं ललितादिक सखियाँ झुला रही हैं। दोनों गलबाहीं दिये हुए प्रेमरस विभोर सैकड़ों कामदेव के सौन्दर्य को लजा रहे हैं। दोनों झुक -झुक कर, झूम-झूम कर, प्रेम, रूप एवं रस के सागर झूल रहे हैं। मधुर मुरली बजा रहे हैं तथा राग मल्हार गा रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि आनन्द विभोर कालिन्दी भी अपनी तरंगों से श्यामा श्याम के चरण छू रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 546