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RADHEY RADHEY

निकुंज-माधुरी · पद 10

देखु सखि! अद्भुत कुंज विहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! adbhuta kuñja-bihāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1देखु सखि! अद्भुत कुंज विहार।

2प्यारिहिं भेष बनायो प्यारो, करि सोरह सिंगार।

3उत प्यारी, प्यारे को सुंदर, नटवर वेष सँवार।

4प्यारी कह प्यारे ते"प्यारी", उर आनंद अपार।

5उत प्यारे प्यारिहिं कह"प्यारे", तद्वत रतिरस धार।

6रति विपरीत रास-रस खेलत, आपुहिं आपु बिसार।

7लखति “कृपालु” सखिन ललितादिक, छुपि-छुपि कुंज मझार॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! आज के प्रिया-प्रियतम के अटपरे कुंज-विहार को देख! प्रियतम ने सोलहों शृंगार करके प्यारी का वेष बनाया है, एवं प्यारी जी ने भी प्रियतम का मनोहर नटवर वेष बनाया है। इसके पश्चात् प्यारी जी ने आनन्द विभोर होकर प्रियतम को 'हे प्यारी'कहकर पुकारना आरम्भ किया, एवं प्रियतम ने भी प्यारी जी को "हे प्यारे! कहकर पुकारना आरम्भ किया। इतना ही नहीं वरन् उसी प्रकार की प्रेम रस की बातें भी करने लगे। अपने आपको भूलकर प्रेमविभोर भावावेश की अवस्था में उलटे प्रकार से रास-विलास आदि लीलायें भी करने लगे। 'कृपालु' कहते हैं कि इस विपरीत विहार को ललितादिक सखियाँ कुंज लताओं में छुप-छुपकर देख रही हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 545