महासखी-माधुरी · पद 8
सुदेवी सबै सखिन सिरमोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sudevī sabai sakhina siramora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुदेवी सबै सखिन सिरमोर।
2दामिनि-दुति दमकति तनु आभा, लेति काम चित चोर।
3पहिरे सुही वसन तन सोहति, जनु सिंगार-निचोर।
4वर वेनी गूँथति सुख-देनी, रिझवति युगल-किशोर।
5खंजन नैन लगावति अंजन, भरि दोउ नैननि कोर।
6मनभाई “कृपालु” दोउन की, मुहँलग, अति बरजोर॥
हिन्दी भावार्थ
सुदेवी सखि समस्त सखियों में श्रेष्ठ हैं। इनके शरीर की कांति बिजली के समान है, एवं यह कामदेव को भी मोहित करने वाली हैं। सुही रंग के कपड़े पहनती हैं। स्वयं मूर्तिमान शृंगार के समान हैं। श्यामा-श्याम की वेणी गूँथने एवं बालों के शृंगार करने का कार्य करती हैं तथा खंजन के समान नेत्रों के दोनों कोरों को भरती हुई अंजन लगाती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि यह दोनों की ही अत्यंत मनभाई, ढीठ एवं मुँहलगी हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 534-535