निकुंज-माधुरी · पद 1
अरि देखो आली, लाली को फुलन सिंगार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ari dekho ālī! lālī ko phulana siṅgāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरि देखो आली, लाली को फुलन सिंगार।
2फुलन की चंद्रकला सिर सोहति, फुलन की वंदनिधार।
3झूमत श्रवण फुलन के झुमके, बेसर कलिन निहार।
4पहुँची बाजूबंद फुलन को, फुलन को गल बिच हार।
5नीलांबर पर फुलन पंक्ति जनु, तारे गगन अपार।
6फुलन की पायल अँगुरिन बिछुये, वेणिहिं फुलन सँवार।
7अंग अंग प्रति फुलन रंग रँग, लखि “कृपालु” बलिहार॥
हिन्दी भावार्थ
फूलों के शृंगार से सजी हुई किशोरी जी को देखकर क सखी अपनी अंतरंग सखी से कहती है कि अरी खी! देख तो किशोरी जी का फूलों से किया हुआ श्रृंगार या ही सुन्दर प्रतीत हो रहा है। सिर में फूलों की चन्द्रकला भित हो रही है; एवं फूलों की बंदनवार धारण कर रखी है। गन में फूलों के झुमके हिल रहे हैं तथा नाक में कलियों को सर शोभायमान हो रही है हाथ में फूलों के ही बाजूबन्द एवं हुँची पहने हैं, एवं गले में विविध प्रकार के फूलों का हार रखा है। नीले वस्त्र पर फूलों की कतारें इस प्रका शोभा दे रही हैं मानो नीले आकाश में तारे खिले हों। पैः में फूलों की पायल एवं अंगुलियों में बिछुये पहने हु हैं। वेणी भी विविध प्रकार के फूलों से सुशोभित हो रह है। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार प्रत्येक ही अंग रंग-बिरंगे फूलों के शृंगार को देखकर मैं बार-बार बलिहा जाता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 536-537