निकुंज-माधुरी · पद 2
आजु दोउ, झूलन महँ झगरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju dou, jhūlana mahaṁ jhagare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु दोउ, झूलन महँ झगरे।
2जब ह्वै गयो श्रृंगार सबै विधि, झूलन कदम परे।
3तब प्यारी प्रीतम सोँ इमि कह, वचन गुमान भरे।
4"तुम झूलो या हम झूलें, नहिं, दोउ इक संग सरे"।
5पिवु कह,"दोउ इक सँग झूलें या, रह दोउ संग खरे"।
6कह “कृपालु” दोउ एकहिं तब का, आपुहिं आपु लरे॥
हिन्दी भावार्थ
आज प्रिया प्रियतम दोनों ही झूलने में झगड़ा क रहे हैं। जब सब प्रकार से शृंगार हो गया एवं झूला भी कदम की डाल में पड़ गया तब किशोरी जी ने श्यामसुन्दर स्वाभिमानपूर्वक कहा कि या तो झूले में तुम्हीं अकेले झूलो तो हम ही अकेले झूलें, हम दोनों एक साथ नहीं झूल सकते क्योंकि तुम झूलते समय ऊधम करते हो। श्यामसुन्दर ने कह कि यह नहीं हो सकता, या तो हम दोनों साथ ही साथ झूलें या तो साथ ही खड़े रहेंगे। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे बर आश्चर्य है कि जब तुम दोनों एक ही हो तब अपने आप अपने आप क्यों लड़ रहे हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 537