निकुंज-माधुरी · पद 3
आजु रस, बरसत कुंजन माहिं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju rasa, barasata kuñjana māhiṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु रस, बरसत कुंजन माहिं।
2मंजु-निकुंजनि-मंजुलता लखि, विधि विधिताहुँ लजाहिं।
3झूला डर्यो कदंब डार पै, पै झूलत दोउ नाहिं।
4पिय कह प्यारी ते"तुम झूलहु, हौं तोहिं काहिं झुलाहिं"।
5प्यारी कह पिय ते"तुम झूलहु, हौं झुलवहुँ तोहि काहिं"।
6नहिं कोउ झूलत नाहिं झुलावत, बहु विधि सखि समुझाहिं।
7तब “कृपालु” कह तुम दोउ झूलहु, हम दोउ झुलवत आहिं॥
हिन्दी भावार्थ
आज कुंज में विलक्षण रस बरस रहा है। सुन्दर निकुंज की सुन्दरता देखकर ब्रह्मा की कारीगरी भी लज्जित होती है। यद्यपि कदम्ब की डाल में झूला पड़ा है किन्तु प्रिया प्रियतम दोनों ही नहीं झूलते। श्यामसुन्दर कहते हैं कि हे सुकुमारी! तुम झूलो और मैं झुलाऊँ। किशोरी जी कहती हैं के हे सुकुमार! तुम झूलो और मैं झुलाऊँ। इस प्रकार न कोई भूलता है और न कोई झुलाता है। सब सखियाँ समझा-समझाकर थक गयीं। तब 'कृपालु' ने कहा कि तुम दोनों में न कोई एक भूले और न कोई एक झुलावे वरन् तुम दोनों साथ बैठकर थूलो और मैं झुलाऊँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 538