# सुदेवी सबै सखिन सिरमोर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0554-M13-K008
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: महासखी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 8
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 260–260

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुदेवी सबै सखिन सिरमोर।  
<a id="line-2"></a>दामिनि-दुति दमकति तनु आभा, लेति काम चित चोर।  
<a id="line-3"></a>पहिरे सुही वसन तन सोहति, जनु सिंगार-निचोर।  
<a id="line-4"></a>वर वेनी गूँथति सुख-देनी, रिझवति युगल-किशोर।  
<a id="line-5"></a>खंजन नैन लगावति अंजन, भरि दोउ नैननि कोर।  
<a id="line-6"></a>मनभाई “कृपालु” दोउन की, मुहँलग, अति बरजोर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

सुदेवी सखि समस्त सखियों में श्रेष्ठ हैं। इनके शरीर की कांति बिजली के समान है, एवं यह कामदेव को भी मोहित करने वाली हैं। सुही रंग के कपड़े पहनती हैं। स्वयं मूर्तिमान शृंगार के समान हैं। श्यामा-श्याम की वेणी गूँथने एवं बालों के शृंगार करने का कार्य करती हैं तथा खंजन के समान नेत्रों के दोनों कोरों को भरती हुई अंजन लगाती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि यह दोनों की ही अत्यंत मनभाई, ढीठ एवं मुँहलगी हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 534-535

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
